देहरादून-: राजधानी देहरादून यूँ तो अपने उत्तराखंड की राजधानी होने भर से गौरवांकित है किंतु यहां पहाड़ियों के बीच सुंदर व मनोरम दृश्य सदैव से देश दुनिया से पर्यटक व सैलानी राजधानी देहरादून आते है। राजधानी का यह आकर्षण पर्यटन को बूस्टअप करने व स्थानियो के रोजगार की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है किंतु बीते कुछ वर्षों में राजधानी देहरादून में घरेलू स्तर पर 10 लाख से अधिक गाड़ियों का लोड बढ़ा है, जिससे राजधानी की सड़कों पर हर दिन, हर घंटे हर स्तर, हर क्षेत्र में यातायात का दबाव बढ़ रहा है। आज 2025 में शहर का आलम यह है कि शहर का स्थानीय नागरिक सुबह 10-11 बजे सड़क पर अपना दोपहिया वाहन लेकर निकले तो जहां 1 दशक पहले वह अपने एक निर्धारित गंतव्य में 10 या अधिकतम 15 मिनट पर पहुँचता था वहीं आज वह औसतन 40 से 50 मिनट पर अपने मंज़िल के दीदार करता है। और चौपहिया वाहनो के इस सफर का तो हम अंदाज़ा खुद लगा सकते है! दोपहिया वाहन तो किसी तरह बीच से रेंक कर पार हो ही जाता है किंतु चौपहिया वाहन चौपहिया से आगे निकलने की होड़ में जाम को न्योता ही देते है। और पर्यटन सीजन व वीकेंड में तो यह मंजर और दर्द देता है। ऐसा नही है कि प्रशासन,- शासन के संज्ञान में यह मामला नही। दोनो के द्वारा अपने स्तर पर शहर को जाम मुक्त बनाने को भरसक प्रयास किये गए व किये जा रहे है। पुलिस स्तर पर ही कप्तान अजय सिंह व उनकी टीम हर स्तर पर खासतौर पर किसी आयोजन व त्योहार के मौके पर अधिकारियों संग स्वयं से 24*7 सड़को पर मौजूद रहकर यातायात सम्भाला जाता है,किन्तु उसके बावजूद भी शहर में सुबह-शाम रेंगते वाहन, लगातार बजते हॉर्न, सिग्नलों पर लंबी कतार आदि आम बात हो गयी। किन्तु हम जमीनी स्तर पर हम में से किसी ने सोचा कि इसकी असल वजह कौन है? हम, राजधानी वासी ही कहीं न कहीं शहर के बढ़ते जाम की वजह है।
बाजार जाना हो भले ही एक आदमी को जाना हो या ज़्यादा से ज़्यादा दो लोगो को हम दोपहिया की जगह चौपहिया वाहनो में जाते है, जबकि शहरवासी इस बात से अनभिज्ञ नही है कि शहर में पार्किंग की समस्या है। स्कूलों में पढ़ने वाले अपने 'एक बच्चे' को लेने जाने को दोनो अभिभावक स्कूल आते है और ऊपर से कार में सवार होकर आते है, ऐसे में स्कूलों के बाहर चौपहिया की लंबी कतार लगना स्वाभाविक है, और उनकी गाड़ियों के एक साथ सड़को पर उतरने से सड़कों पर 1-1 किमी तक जाना लगना भी स्वाभाविक ही है! और ट्रैफिक रूल्स की धज्जियां उड़ाने में तो हमारा कोई मुकाबला नही। सिग्नलों पर सफेद पट्टी से पहले गाड़ी रोकने का कानून है किंतु हम खिसकते-खिसकते इतनी आगे आ जाते है कि दूसरी तरफ की गाड़ियों को भले ही फिर अपने गंतव्य में जाने में दिक्कत हो, हम नही हटेंगे। लेफ्ट टर्न फ्री रखना रूल है किंतु हम सब सिग्नल खुलते ही सबसे पहले निकले की होड़ में लेफ्ट टर्न तो भी टेकओवर करने में शर्म नही करते। एक लाइन में खड़ी गाड़ियों और जाम लगने में बगल वाली गाड़ियों को दोष देते है। गाड़ियों की लंबी लाइन में खड़ा रहकर इंतजार करने से भला लेफ्ट टर्न को टेकओवर करना बेहतर है ताकि जल्दी निकला जाए, इसी मानसिकता के शिकार है। और अगले दिन अखबारों में शहर के जाम की स्थिति देखे तो 'अरे! इनका तो यही हाल है। जाम का बड़ा बुरा है' का तंज कसते हुए अखबार का पन्ना पलटते है किंतु अपनी जिंदगी का वह पल नही पलटते की उस जाम को बढ़ाने में हम भी भागीदार है जो कोई भी नियम नही मानते न ही शहर को ट्रैफिक मुक्त करने को खुद से कोई सहयोग करते है! शहर के इस जाम में भागीदार वह सरकारी कर्मचारी भी है खासतौर पर शासन- प्रशासन के वह खास व्यक्ति भी है जिनको दो पहिया वाहन में चलने में शर्म महसूस होती है, उनकी शान कम हो जाती है। अगर उनकी गाड़ियों के आगे 2-4 गाड़ियों का जाम लग जाये तो हूटर बजने शुरू हो जाते। लगातार बजते हूटर के चलते ट्रैफिक कर्मी को मजबूरी से उनके लिए रास्ता खोलना पड़ता है। खास लोगो के लिए रास्ता खोलने के बात जाम लगना भी स्वभाविक हो जाता है। शहर में सड़कें सीमित है, और अगर चौड़ीकरण के लिए प्लान बनाये जाए या सड़क निर्माण अथवा अतिक्रमण के खिलाफ कोई नया प्रपोजल आये तो सबसे पहले नेता ही अतिक्रमकारियो के सपोर्ट में सबसे आगे नज़र आते है, तो ऐसे में 'विकास' की राह कैसे तय हो भाई!
और मनमानी पार्किंग करने वालो के तो कहने ही क्या! आड़ी-तिरछी गाड़ी लगा शॉपिंग को निकल जाते है फ़िर चाहे उस में आने व जाने वाले दोनो साइड की गाड़ी को आफत भरी दिक्कत क्यों न हो, हमे क्या? हम तो अपना काम करने आये है!
आम जनता बनकर गाड़ियों में बैठकर जाम की भरसक बुराई करना हमने हर दिन सीखा है, चौराहे पर जाम मैनेज करते जवान को हमने कोसना भरपूर सीखा है,किन्तु खुद जाम से बचने को हमारे द्वारा क्या प्रयास व सहयोग किया गया वह नही सोच सकते। खाली पुलिस के भरोसे साल काटते है। जबकि हमने सोचना चाहिए पुलिस जाम को नियंत्रित करने को मैनेज कर सकती है, गाड़ियों को खुद से उठाकर गंतव्य तक थोड़ी छोड़ सकती है, और सड़के तो जितनी है, उतनी ही रहेगी। गाड़ियों के बढ़ने से सड़क खुद से चौड़ी थोड़ी हो जाएगी। जरूरत है कि, हम सबको जिम्मेदार राजधानी वासियो की तरह सोचना होगा और जाम नियंत्रित न सही कम से कम कुछ हल्का करने को अपने स्तर पर प्रयास करना होगा, वरना हर साल जाम को अपनी गाड़ियों में बैठकर कोसना को आज भी आसान है, और पुलिस बल का क्या है 'वह तो हमारे न सुनने पर भी' कल भी जिम्मेदारी निभा रही थी आगे भी निभा लेगी।