देहरादून: उत्तराखंड राज्य अपनी प्राकृतिक संपदा व पहाड़ी क्षेत्र के चलते 11वे पहाड़ी राज्य में गिना जाता है। शुद्ध हवापानी के साथ साथ पहाड़ी क्षेत्रों में सौंदर्य से भरपुर ये जंगल हर किसी को अपनी ओर आकर्षित तो करते है लेकिन खूबसूरत देखने वाले यही जंगल गर्मियों में रौद्र रूप धारण कर लेते है।
जलते जंगलों का कौन है ज़िम्मेदार?
उत्तराखंड में चीड़, बांज, साल और शीशम के पेड़ पाये जाते है और गर्मियों में आग लगने के अहम कारण भी यही है। इनमे से भी चीड़ की पत्तियां जिसे (पिरूल) भी कहा जाता है बहुत जल्दी आग पकड़ती हैं। ये पिरूल बहुत ज्वलनशील होते हैं और इनमें पेट्रोल से भी ज्यादा आग फैलाने की क्षमता होती है। अगर बात की जाये जंगलों में आग लगने के मुख्य कारणों की तो वनाग्नि लगने के पीछे मानवीय लापरवाही और प्राकृतिक कारण दोनों जिम्मेदार होते हैं, लेकिन हाल के वर्षों में मानवीय गतिविधियाँ वनाग्नि का सबसे प्रमुख कारण बनकर उभरी हैं।
बारिश नहीं होने के कारण जमीन पर पत्ते कागज की तरह जल रहे हैं। स्थिति चिंताजनक है क्योंकि जंगल की आग के लिए सबसे खराब समय - मई व जून का महीना है जब तापमान सबसे अधिक होता है और अभी तो अप्रैल ही चल रहा है।
ग्लोबल वार्मिंग के चलते उच्च तापमान और शुष्क सर्दियों के कारण वर्षा की गंभीर कमी इसका कारण है अगर मानवीय कारणों की बात की जाय तो ग्रामीण अपने मवेशियों के लिए चारे की बेहतर उपलब्धता की उम्मीद में सूखी घास जला देते हैं। इससे कभी-कभी बड़ी आग लग सकती है। जलती हुई सिगरेट छोड़ना, खाना पकाना या अलाव जलता छोड़ देने से भी जंगल में आग लग सकती है। खराब कचरा प्रबंधन भी स्थानीय लोगों और अधिकारियों को सूखे कचरे से छुटकारा पाने के लिए कचरा जलाने के लिए मजबूर करता है, जिससे आग लग जाती है।
बेज़ुबानो पर मंडराता ख़तरा
फारेस्ट फायर से न केवल वन संपदा, बल्कि वन्यजीवों को भी बहुत ज्यादा नुकसान पहुँचता है। आग की चपेट में आने से कई बेजुबान जानवर अपनी जान गंवा देते हैं तो कई बेघर होकर गांव की ओर पलायन करते है।
उत्तराखंड में वनाग्नि केवल जंगलों की समस्या नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण, वन्यजीवों और मानव जीवन के लिए गंभीर खतरा है। इसे रोकने के लिए सरकार, वन विभाग और आम नागरिकों को मिलकर सतर्कता और जिम्मेदारी से कार्य करना होगा। समय पर रोकथाम और जागरूकता के माध्यम से ही हम अपने जंगलों और प्राकृतिक संपदा की रक्षा कर सकते हैं।