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स्कूल हैं, लेकिन बच्चे नहीं खाली होती कक्षाओं की सच्चाई*

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स्कूल हैं, लेकिन बच्चे नहीं खाली होती कक्षाओं की सच्चाई*

shikhrokiawaaz.com

04/15/2026

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में एक अजीब और चिंताजनक तस्वीर उभर रही है—स्कूल तो खड़े हैं, लेकिन उनमें पढ़ने वाले बच्चे नहीं हैं। जहां कभी सुबह की प्रार्थना की आवाज़ गूंजती थी, आज वहां सन्नाटा पसरा है। यह सिर्फ शिक्षा का संकट नहीं, बल्कि समाज और भविष्य दोनों के लिए खतरे की घंटी है।
दरअसल, इसका सबसे बड़ा कारण लगातार बढ़ता पलायन है। रोजगार, बेहतर शिक्षा और सुविधाओं की तलाश में लोग गांव छोड़कर शहरों की ओर जा रहे हैं। इसका सीधा असर सरकारी स्कूलों पर पड़ा है। कई स्कूलों में छात्रों की संख्या इतनी कम हो गई है कि एक या दो बच्चों के लिए पूरी व्यवस्था चलानी पड़ रही है। कहीं-कहीं तो हालात ऐसे हैं कि शिक्षक हैं, लेकिन पढ़ाने के लिए छात्र ही नहीं।
इस स्थिति को कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है। पौड़ी गढ़वाल और चमोली जैसे जिलों के कई गांवों में ऐसे प्राथमिक विद्यालय हैं जहां केवल 2–3 बच्चे ही पढ़ते हैं। कुछ जगहों पर तो एक ही शिक्षक पूरी कक्षा संभाल रहा है। वहीं, अल्मोड़ा क्षेत्र में कई स्कूल ऐसे भी पाए गए हैं जहां पूरे साल में छात्रों की संख्या इतनी कम रहती है कि स्कूल बंद करने तक की नौबत आ जाती है। ये उदाहरण साफ दिखाते हैं कि समस्या कितनी गंभीर हो चुकी है।
इस स्थिति का एक और पहलू भी है—शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल। कई अभिभावक अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए निजी स्कूलों या शहरों में भेजना पसंद करते हैं। सरकारी स्कूलों की गिरती साख और संसाधनों की कमी ने भी इस समस्या को और गहरा किया है,परिणामस्वरूप, गांव के स्कूल धीरे-धीरे केवल इमारत बनकर रह गए हैं।
इसका असर केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है,जब गांवों से बच्चे और युवा ही नहीं रहेंगे, तो वहां का सामाजिक ढांचा भी कमजोर हो जाएगा। आने वाले समय में ये खाली स्कूल, खाली गांवों की पहचान बन सकते हैं। यह स्थिति राज्य के संतुलित विकास पर भी सवाल खड़ा करती है।
समाधान की बात करें तो केवल स्कूल खोल देना काफी नहीं है,जरूरी है कि गांवों में रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएं, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारी जाए और बुनियादी सुविधाएं मजबूत की जाएं। डिजिटल शिक्षा, स्थानीय स्तर पर शिक्षकों की नियुक्ति और स्कूलों को आकर्षक बनाने जैसे कदम भी मददगार हो सकते हैं।
अंततः यह समझना होगा कि स्कूलों में बच्चों की कमी केवल शिक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक समस्या का संकेत है। अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले वर्षों में न केवल स्कूल खाली होंगे, बल्कि पूरे के पूरे गांव वीरान हो जाएंगे।
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