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कानून पर ही हमलावर हो रही जनता...मर्यादा कहाँ?

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कानून पर ही हमलावर हो रही जनता...मर्यादा कहाँ?

shikhrokiawaaz.com

08/15/2025


देहरादून-: हमारे लिए, हम सभी के लिए नियम कायदे बनाये गए है,जिन्हें हम कानून की नज़र में,सभ्य व जिम्मेदार समाज मे निभाने है, और उन नियमो का अनुपालन करवाने को या यूं कहें उनके संरक्षण को कानून ने 'पुलिस' महकमा बनाया है,जो कहीं न कहीं नियम कायदों को लागू करवाने सहित हमपर कोई भी मुसीबत आती है तो हमारे लिए सबसे अग्रिम पथ पर खड़ी रहती है। कई मर्तबा हमारे और मुश्किल के बीच सुरक्षा दीवार बनकर खड़ी रहती है और हो सके तो परेशानी का हल भी खोज लेती है। किंतु आज नियम कायदे तोड़ने की आदत में हम इस कदर अंधे हो गए है, कि कानून के रखवालों से बर्ताव करने की अपनी मर्यादा भूल चुके है। जिन्हें हम मुश्किलों में पुकारते है उन्हीं पर हमलावर होने से तनिक भी गुरेज नही कर रहे है, उल्लंघन ऐसा कि हाथापाई पर उतर रहे है! 

थाना नेहरुकोलोनी अंतर्गत रेसकोर्स निवासी एक महिला के घर की बिजली की तार बीती बुधवार को टूट गयी थी,जिसपर उनके द्वारा बिजली विभाग को शिकायत की तो बिजली विभाग तार डालने आयी तो पड़ोसी महिला उस महिला से ही भीड़ गयी। वादी महिला ने पुलिस से सहायता मांगी तो मौके पर पुलिस आई तो महिला उलटा पुलिस पर ही हावी हो गयी। मोबाइल फोन तो महिला द्वारा इस कदर इस्तेमाल किया गया कि महिला पुलिस कर्मियों के समझाने भर की बात पर अपनी बेटी संग पुलिस की कार्यवाही का वीडियो बनाने लगी। महिला दरोगा द्वारा जब उक्त महिला व उसकी बेटी को तार गुजरने वाली जगह को सड़क बताकर महिला की बेटी को पीछे रास्ते की एक बार देख वीडियो बनाने को कहा तो वह पुलिस पर हाथ उठाने की बात पर चिलम चिल्ली पर उतर आई। युवती भी पुलिस को उंगली दिखाने से बाज नही आई, बदले में पुलिस ने भी रोका तो नाबालिक पर हाथ उठाने का नारा लगाकर पुलिस कर्मियों पर आरोप मढ़ने से भी गुरेज नही किया। महिला दरोगा द्वारा माँ-बेटी को सरकारी काम मे बाधा डालने से मना किया तो नाइंसाफी का ठीकरा भी कानून के सिर मढ़ दिया। इस सब विवाद में सोचने वाली बात है कि जब कानून के रखवालों पर ही आम जनता हावी होने लगेगी तो कानून के मायने सिखाये किसे जाएंगे? कानून पर हाथ उठाकर कानून को 'गलत' बताने का जिगरा भी समाज मे गजब है, खुले आम पुलिस पर हाथ उठाते है और बदले में पुलिस कर्मी अपना बचाव करें तो "हमपर कानून नाइंसाफी करता है" का ढिंढोरा भी पीट रहे है। 

मोबाइल के सहारे पुलिस कर्मियो की आवाज़ दबाकर खुद की आवाज़ बुलंद करके कानून की राह में रोड़ा बनना कहाँ तक जायज है और इससे समाज के किन लोगों की श्रेणी की अपनी छवि दिखा रहे है? क्या हाथ मे मोबाइल होने से 'वायरल करने' के फितूर व धमकी देने से हमे सरकारी काम मे बाधा डालने का हक मिल जाता है?और महिला होने का गलत इस्तेमाल कर महिला कर्मियों पर हाथापाई करना क्या जायज है? 

स्पष्ट सवाल है कि जो लोग खुद ही कानून व कानून के ररखवालों की इज्जत नही करेंते वह कानून से न्याय की उम्मीद किस मुँह से करते है?
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