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उत्तराखंड की जमीन पर बढ़ते दबाव को लेकर चिंता, भूमि खरीद और भू-कानून की जांच की मांग

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उत्तराखंड की जमीन पर बढ़ते दबाव को लेकर चिंता, भूमि खरीद और भू-कानून की जांच की मांग

shikhrokiawaaz.com

08/11/2026

देहरादून:उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ती भूमि खरीद-फरोख्त, कृषि भूमि के कथित व्यावसायिक इस्तेमाल और भू-कानून के प्रावधानों के संभावित दुरुपयोग को लेकर अधिवक्ता सेवा मंच उत्तराखंड एवं पहाड़ स्वाभिमान सेना ने चिंता जताई है।
आज मंगलवार को देहरादून में आयोजित पत्रकार वार्ता में दोनों संगठनों के प्रतिनिधियों ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में जमीन के बढ़ते व्यावसायीकरण पर समय रहते प्रभावी निगरानी नहीं की गई तो इसका सीधा असर स्थानीय लोगों के भूमि अधिकारों, पर्यावरण और जल स्रोतों पर पड़ सकता है। वक्ताओं ने सरकार से ऐसे मामलों की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की।
पत्रकार वार्ता में पौड़ी गढ़वाल के एराड़ी गांव में दून हैचरीज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा करीब 144 नाली भूमि खरीदे जाने का मामला भी उठाया गया। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि भूमि खरीद के समय दस्तावेजों में इसका प्रयोजन कृषि कार्य दर्शाया गया, जबकि बाद में जमीन को छोटे-छोटे भूखंडों में बांटकर बाहरी लोगों को बेचने की प्रक्रिया किए जाने की बात सामने आई है। उन्होंने कहा कि इस मामले में भूमि खरीद से लेकर वर्तमान स्थिति तक के राजस्व अभिलेख, रजिस्ट्री दस्तावेज, भूमि उपयोग, आवश्यक अनुमतियां और भूखंडों की बिक्री से जुड़े दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके।
वक्ताओं ने संबंधित कंपनी के गठन और उसकी पुरानी संपत्तियों से जुड़े दावों पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि कंपनी की ओर से वर्ष 2003 से पहले की भूमि खरीद का आधार प्रस्तुत किए जाने के साथ देहरादून में वर्ष 1997 में संपत्ति खरीदे जाने का दावा किया गया है। पत्रकार वार्ता में कहा गया कि जिन तारीखों और पंजीकरण विवरणों के आधार पर ये दावे किए जा रहे हैं, उनके मूल अभिलेखों की जांच जरूरी है। उन्होंने कहा कि कंपनी के वर्ष 1995 में गठित होने का दावा किया जाता है, जबकि वर्तमान निदेशक मंडल में शामिल व्यक्तियों के निदेशक बनने की तिथियां वर्ष 2016 के बाद की बताई जा रही हैं। ऐसे में पूर्व में खरीदी गई संपत्तियों और कंपनी की वर्तमान संरचना के बीच वास्तविक कानूनी एवं स्वामित्व संबंधों की जांच की जानी चाहिए।
अधिवक्ता सेवा मंच के अध्यक्ष एडवोकेट संदीप चमोली ने कहा कि किसी कंपनी के पुराने पंजीकरण को मात्र आधार बनाकर उसे उत्तराखंड में भूमि खरीद की सुविधा नहीं मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि कंपनी का वास्तविक कार्य, वर्तमान निदेशक, स्वामित्व संरचना और खरीदी गई जमीन का मौजूदा उपयोग भी जांच के दायरे में होना चाहिए। उन्होंने सरकार से कंपनी के गठन, निदेशकों, पूर्व निदेशकों, शेयरहोल्डिंग, संपत्तियों और उत्तराखंड में किए जा रहे कार्यों का विस्तृत परीक्षण कराने की मांग की।
पहाड़ स्वाभिमान सेना के अध्यक्ष पंकज उनियाल ने कहा कि यदि किसी भूमि को एक उद्देश्य बताकर खरीदा गया है और बाद में उसका इस्तेमाल किसी दूसरे, विशेषकर व्यावसायिक उद्देश्य के लिए किया जा रहा है तो उसकी वैधानिकता की जांच आवश्यक है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में पुरानी कंपनियों के माध्यम से भूमि खरीद से जुड़ी शर्तों को दरकिनार किए जाने की आशंका की भी पड़ताल होनी चाहिए। उन्होंने वर्ष 2003 से पहले अस्तित्व में आई कंपनियों के नाम पर उत्तराखंड में खरीदी गई भूमि का जनपदवार ऑडिट कराने की मांग की।
पत्रकार वार्ता में वर्ष 2017-18 के दौरान भू-कानून में किए गए संशोधनों और विशेष रूप से धारा 154 से जुड़े प्रावधानों की समीक्षा का मुद्दा भी उठाया गया। वक्ताओं ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां मैदानी क्षेत्रों से अलग हैं। ऐसे में बाहरी व्यक्तियों एवं संस्थाओं द्वारा भूमि खरीद और उसके बाद होने वाले व्यावसायिक इस्तेमाल पर प्रभावी निगरानी की व्यवस्था जरूरी है। उन्होंने सरकार से वर्तमान भू-कानून की व्यापक समीक्षा कर स्थानीय लोगों के हितों और पर्वतीय क्षेत्रों की परिस्थितियों के अनुरूप अधिक प्रभावी प्रावधान लागू करने की मांग की।
वक्ताओं ने पौड़ी गढ़वाल के लैंसडौन और यमकेश्वर क्षेत्रों में भूमि खरीद-फरोख्त, प्लॉटिंग और भूमि उपयोग परिवर्तन से जुड़े मामलों की भी जांच की मांग की। उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों में राजस्व, वन, विकास प्राधिकरण और अन्य संबंधित विभागों की संयुक्त टीम गठित कर विशेष अभियान चलाया जाना चाहिए, जिससे यह पता लगाया जा सके कि भूमि खरीद और निर्माण से जुड़े मामलों में सभी आवश्यक नियमों और अनुमतियों का पालन हुआ है या नहीं।
कैटल गांव में कथित पेड़ कटान के बाद आश्रम निर्माण और निर्माण स्थल तक पहुंचने वाले रास्ते को लेकर भी पत्रकार वार्ता में सवाल उठाए गए। वक्ताओं ने कहा कि यदि रास्ता आरक्षित वन क्षेत्र से होकर गुजर रहा है तो उसके निर्माण की अनुमति, जमीन की स्थिति और वन कानूनों के अनुपालन की जांच की जानी चाहिए। उन्होंने आश्रम के लिए खरीदी गई भूमि में कथित रूप से मौजूद बहुमूल्य पेड़ों का भूमि खरीद से संबंधित दस्तावेजों में उल्लेख नहीं होने के आरोपों की भी जांच कराने की मांग की। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि मामले की वास्तविक स्थिति राजस्व और वन विभाग के मूल अभिलेखों की संयुक्त जांच के बाद ही सामने आ सकती है।
पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक जल स्रोतों पर बढ़ते दबाव को लेकर भी संगठनों ने चिंता जताई। वक्ताओं ने कहा कि आश्रमों, होटल, रिसॉर्ट, वेलनेस सेंटर और पंचकर्म केंद्रों में कथित रूप से की जा रही बोरिंग तथा भूजल के इस्तेमाल की जांच जरूरी है। उनका कहना था कि पहाड़ों में प्राकृतिक जल स्रोत बेहद संवेदनशील हैं और बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों द्वारा अत्यधिक भूजल दोहन किए जाने की स्थिति में इसका असर स्थानीय ग्रामीणों के जल स्रोतों पर पड़ सकता है। उन्होंने ऐसे सभी प्रतिष्ठानों की बोरिंग, जल उपयोग और संबंधित अनुमतियों का विभागीय एवं वैज्ञानिक ऑडिट कराने की मांग की।
यमकेश्वर क्षेत्र में कृषि भूमि पर आश्रम, वेलनेस सेंटर, पंचकर्म केंद्र और रिसॉर्ट जैसी व्यावसायिक गतिविधियों का मुद्दा उठाते हुए वक्ताओं ने कहा कि भूमि खरीद के समय घोषित उद्देश्य और वर्तमान उपयोग का मिलान किया जाना चाहिए। उन्होंने मांग की कि ऐसे मामलों में भूमि उपयोग परिवर्तन, नक्शा स्वीकृति, निर्माण अनुमति, पर्यटन विभाग की मंजूरी, पर्यावरणीय स्वीकृति, जल उपयोग और अन्य जरूरी अनुमतियों की जांच की जाए।
वक्ताओं ने यह भी कहा कि यदि जांच में भूमि खरीद या उसके उपयोग में नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो जांच केवल जमीन खरीदने वाले व्यक्ति या संस्था तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। संबंधित दस्तावेजों को स्वीकृति देने वाली प्रक्रिया और अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उन्होंने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहे सवालों का उल्लेख करते हुए कहा कि नियमों के उल्लंघन की स्थिति में जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
संगठनों ने सरकार से मांग की कि एराड़ी गांव की 144 नाली भूमि की खरीद और उसके बाद की गतिविधियों की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। साथ ही संबंधित कंपनी की संपत्तियों, निदेशकों, शेयरहोल्डिंग और वास्तविक गतिविधियों की जांच के साथ वर्ष 2003 से पहले अस्तित्व में आई कंपनियों द्वारा उत्तराखंड में खरीदी गई जमीन का विशेष ऑडिट कराया जाए। उन्होंने कृषि भूमि पर चल रही व्यावसायिक गतिविधियों की वैधानिकता की जांच, लैंसडौन और यमकेश्वर में भूमि कारोबार की पड़ताल तथा वन क्षेत्रों में किए गए निर्माण और मार्गों की जांच की मांग भी सरकार के सामने रखी।
एडवोकेट संदीप चमोली और पंकज उनियाल ने कहा कि उत्तराखंड की जमीन केवल आर्थिक संपत्ति नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की विरासत है। उनके मुताबिक भू-कानून का उद्देश्य सिर्फ जमीन की खरीद-बिक्री को नियंत्रित करना नहीं होना चाहिए, बल्कि स्थानीय लोगों के हित, पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक जल स्रोतों और पर्वतीय क्षेत्रों की सामाजिक संरचना को भी सुरक्षित रखना जरूरी है। उन्होंने सरकार से मांग की कि पत्रकार वार्ता में उठाए गए मामलों को राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित न रखते हुए संबंधित दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच कराई जाए और जांच में जो तथ्य सामने आएं उन्हें सार्वजनिक किया जाए। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति, कंपनी या अधिकारी द्वारा नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
पत्रकार वार्ता में एडवोकेट संदीप चमोली, पंकज उनियाल, एडवोकेट नवनीत कुकरेती, एडवोकेट हरेंद्र बेदी, सामाजिक कार्यकर्ता अनिल डोभाल, एडवोकेट विनीत मिश्रा, एडवोकेट कीर्ति वर्धन बिष्ट और एडवोकेट प्रदीप पासवान मौजूद रहे।
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