अर्जुन सिंह भण्डारी
कोई ठग कितना भी चालक क्यों ना हो उसका किया हुआ काम अपराध कभी न कभी तो खुलता ही है। अन्वेषण करने वालो को बस जरूरत होती है कि वह बारीकी से निरीक्षण करें जिससे संभवित है अपराधी कितने ही खोल(कवर) अपने ऊपर चढ़ा के बैठा हो वह टूट ही जाते है। राजधानी देहरादून में पारंपरिक अपराधों व मॉडर्न डे साइबर हमलों के अलावा आज की तारीख में जमीनी फर्जीवाड़े व ठगी का गिरोह सबसे बड़े स्तर पर सक्रिय है। राजधानी में कैंसर की तरह पैर पसार चुके भूमाफियाओ व पैसे के लिए ठगी करने वालो की पकड़ से आज शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा होगा जहां उनकी निगाह न होगी।
ठगी करने वाले सिंडिकेट के रूप में सक्रिय है। जांच में पुलिस की आंच उनतक पहुँच जाए एयर उनके उनके आकाओं तक पहुँच जाती है तो वो अपने उस समाज का सहारा लेते हैं जिसमे वो सफेदपोश(व्हाइट कॉलरड) हैं। वाइट कोलरड बनकर अपराध को अंजाम व शय देना आजकल सबसे आसान है, आम जनता के बीच वह रसूख रखते है तो उनके द्वारा यह अपराध किया जा सकता है, वह शायद ही किसी के जहन में होगा और पकड़े जाने की बारी आई तो उसकी बिरादरी के लोग उसके पक्ष में सत्ता तक आवाज़ पहुँचाने की ताकत रखते है।
ये लोगो किसी ना किसी बड़े नामी आदमियों की आड़ में अपराध को अंजाम देते हैं,उसके बाद जब इनको पुलिस पकड़ती है तब ये अपने आप को ऐसे पेश करते हैं जैसे इनके जैसा पवित्र कोई नही!
अगर पुलिस पूर्ण सबूत व अन्वेषण के बाद उन अभियुक्तो तक पहुँच जाए तो पुलिस का मनोबल बल तोड़ने में न तो माननीय कोई कसर छोड़ते हैं और न ही न्याय की मूर्ति। पुलिस द्वारा ठगी में शामिल मुख्य अभियुक्त के गिरेबान में हाथ डाला भी कैसे जाए, कानून के पहुँचने से पहले अपराधी या तो अग्रिम जमानत लेकर नए शिकार की तलाश करता है, और यदि गिरफ्तार को जाए तो उसे छुड़वाने को पुलिस की जांच से लेकर शिकायत असल है कि नही, तक पर सवाल उठ जाते है। नतीजन अपराधी के हौसले बुलंद है। जब तक मैं सफेदपोशों का खास हूँ कानून मुझे छू तक नही सकती। नतीजन कोई और पीड़ित उसकी ठगी का शिकार होगा और यह सिलसिला बढ़ता रहेगा।माननीय भी उन्हें अपना हिमायती किस आधार पर बना लेते है सोचने वाली बात है, एक तरफ तो कानून सबके लिए समान, न्याय मिलना चाहिए व विपक्षियों को जिस मुद्दों और कभी विपक्ष में बैठकर घेरते थे आज उसी राह पर खुद चलते है, निश्चित ही खुद का स्वार्थ प्रबल गई, क्योंकि खुद के दाग छिपाने के लिए दूसरों का सहारा(खास) भी बनना पड़ता है, यह कहावत सच कैसे होगी।
सच ही तो है आज भारत मे कानून का भय है ही नही किसी को। पुलिस थाने में आज कितने ही वह अभियुक्त भरे पड़े है, जिनके खिलाफ 6 से 7 मुकदमे दर्ज है,पर उन्हें बचाव के पूरे रास्ते पता है। एक ही तरह के लगातार कई अपराध करता है, पता है मुकदमे दर्ज है किंतु कानून के लूपहोल्स के चलते उसकी जिंदगी उसको भी मिले अधिकारों के चलते सुरक्षित है। न्याय के लिए तो पीड़ित को भटकना है,एड़ी चोटी का जोर लगाना है, उम्मीद बांधे रखनी है, कानून पर भरोसा रखना है। हमारे देश में कानून सच मे बहुत सरल बन चुके है, जिनके लागू होने के साथ ही अभियुक्त उनको तोड़ने व उससे बचने के रास्ते ढूंढ लिए जाते है। उन्ही हौसलो के दमप पर अपराधी आसानी से एक के बाद एक अपराध करते जाते हैं।
हमारे देश मे भी अमेरिका जैसे संघीय कानून लागू होना चाहिये और बिल्कुल होना चाहिए जहां थ्री स्ट्राइक लॉ के तहत 3 बार से ज़्यादा अपराध में लिप्त पाए जाने पर अभियुक्त को आजीवन कारावास है, किन्तु भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बताते- बताते शातिर अभियुक्त के लिए 3 तो बहुत छोटा नंबर है 27 से 28 अपराध भी हो जाये तो कोई बड़ी बात नही। जमानत पर जब भी बाहर कभी तो आ ही जायेगा, तो उसके बाद पुराना काम चालू बाकी ताउम्र सजा भले ही मिले न मिले केस की अवधि उम्र भर चल जाये तो कोई गम नही!