देश के बड़े मीडिया चैनल से ताल्लुख रखने वाली महिला पत्रकार अंजना ओम कश्यप का नाम आज किसी पहचान कामोहताज नही है, किन्तु उनके द्वारा देशभर में ऑनलाइन माध्यमो से छात्र जीवन मे शिक्षा का प्रकाश डाल रहे शिक्षकों पर जो "दो कौड़ी" कहकर छींटाकशी कसी उससे उन्हें अब तक न जानने वाला युवा भी उनकी व उनके जैसे पत्रकारिता के स्तर की तस्वीर पेश करने वाले पत्रकारों को अच्छे से जान चुका होगा। *देश मे एनटीए की नीट परीक्षाओं, सीबीएसई परीक्षाओं की लगातार सामने आती लापरवाही के खिलाफ आज भले ही मेनस्ट्रीम पत्रकार चुप्पी साधे बैठे है किंतु बच्चो के संग उनका भविष्य संवारने को कार्य कर रहे शिक्षक जरूर इन धांधलियों के खिलाफ आवाज उठा रहे है, जबकि यह काम उनका था* जो खुद को "हम बदलने की क्षमता रखते है, हम पत्रकार है, हम देश का चौथा स्तम्भ है" आदि से खुद को बहला जरूर लेते है किंतु देश के युवाओं से जुड़े मुद्दों पर अक्सर ही चुप्पी साधे बैठे दिखाई देते है। आज भारत का मीडिया दुनियाभर की 180 मीडिया श्रेणी में 157 नंबर का स्थान रखता है। और वह इसलिए नही कि भारत मे मीडिया संस्थानो में उपकरणों की कमी है या बढ़ती टेक्नोलॉजी में पीछे है बल्कि इसलिए क्योंकि अंजना ओम कश्यप जैसे पत्रकार पत्रकारिता की फील्ड में कदम रखने के वक़्त ली गयी शपथ "निष्पक्षता, स्पष्टता, सच को बेबाकी से रखना, निजी स्वार्थों के त्याग" को पूर्णतः भूल चुके है।
वर्तमान में *अधिकांश मीडिया हाउसेस टीआरपी, एडवरटीसमेन्ट,एक समूह या पार्टी विशेष के खास बनकर कमाई में ऊपर रहने का टारगेट रखते है, जहां प्राइम टाइम के नाम पर मंदिर बनेगा की मस्जिद बनेगा, विदेश में गए हमारे पीएम द्वारा इटली की पीएम को मेलोडी दी। और मेलोडी टॉफी दी तो दी साहब उसकी टैग लाइन पर भी चर्चा है कि आखिर मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है। यही तो देश के आज प्राइम/ज्वलंत मुद्दे है,क्यों भई! बाकी छात्र सड़को पर क्यों आने को मजबूर है, सालों से एग्जाम की तैयारी कर रहे छात्रों के भविष्य को क्यों अंधकार में धकेल रहे जिम्मेदार सरकारी अथॉरिटीज आदि चर्चा का विषय है ही नही, वह अपनी खुद देखें!* छात्र अपने हक के लिए सड़कों पर रो रहा है, जिस उम्र में घर पर पढ़ाई करनी चाहिए उस समय अपने लिए आवाज़ उठा रहा, सड़को पर लाठियां ख़ा रहा है, बस वह दिखाया जा रहा कि छात्र उपद्रव कर रहे है किंतु क्यों कर रहे है उसको लेकर सवाल पूछने को सम्बंधित अधिकारी के समक्ष इनकी आवाज़ तेज नही होती न माइक उठते है। तो फिर अपने लिए छात्र आवाज़ न उठाएं तो कौन उठाये, जिनको उनके लिए एक मजबूत स्तम्भकार की तरह आवाज़ बनकर खड़ा होना चाहिए उनके मुद्दे तो केवल राजनीति और देश मे धर्म तक सीमित रह गए है। इन छात्रों को मार्गदर्शक देने वाले आज भारत मे कई ऐसे शिक्षक है जो खुद की पढ़ाई के साथ ही ऑनलाइन माध्यमो से छात्रो को ज्ञान दे रहे है, ऐसे में जब छात्रों के साथ धोखा हुआ तो उन्होंने अपने प्लेटफार्म से छात्रो के लिए आवाज़ उठाई तो अंजना ओम कश्यप द्वारा पत्रकारों का काम शिक्षकों के हाथों में जाता देख उन्हें "दो कौड़ी" के शिक्षक जो ऑनलाइन स्क्रीन पर एक पेन लेकर छात्रो को पढ़ा रहे है, जबकि वह भूल गयी कि वह खुद भी कभी किसी शिक्षक से पढ़ी होंगी। आज जो भी ऑनलाइन छात्रो को पढ़ा रहे है वह ऑनलाइन का माध्यम इसलिये चुने बैठे है क्योंकि उससे आज हर छात्र की पहुँच उनतक है। *ऑनलाइन शिक्षा बांट रहे शिक्षक खुद में आईआईटीएन, एमबीबीएस, आईपीएस, आईएएस, सरकारी सेवाओं में सेवारत व सेवाओं को छोड़कर पूर्णतः पढ़ाने पर फोकस कर इस दिशा में आये है। और अगर अंजना ओम कश्यप जैसी पत्रकारों पता हो तो उन्होंने मीडिया का काम नही छीना बल्कि खबरों का विश्लेषण करना उनका मकसद क्योंकि आज तकरीबन हर परीक्षा में करेन्ट अफेयर्स पूछा जाता है, जहाँ मात्र खबर नही खबरों के पीछे की वजह, उनके इंपैट्स आदि पूछा जाता है, जो निश्चित ही मेन स्ट्रीम मीडिया खुद कभी पढ़ाने वाली नही।* तो उनका ऑनलाइन टीचिंग करवा रहे शिक्षकों पर झुंझलाहट उतारना कहाँ से जायज है, क्योंकि न तो शिक्षक घर घर फील्ड रिपोर्टर की तरह खबरें एकत्रित कर रहे न उन्हें टीआरपी चाहिए। हन, यह जरूर सम्भव है कि *मीडिया हाउसेस की क्रेडिबिलिटी आज शून्य स्तर पर है, जिसके चलते आज देश का युवा ही नही देश का 30 से 45 उम्र के नागरिक भी न्यूज़ चैनल के बजाय एजुकेशन या इंफोर्मेटिवे वीडियोज देखना पसंद करते है, जिसमे खबर संग विश्लेषण हो। और ऑनलाइन टीचिंग पलटफॉर्म की क्रेडिबिलिटी ज़्यादा भी है आज तभी वह अपने दमपर आज विज्ञापन भी ले रहे है और टैक्स भी भर रहे है, तो वह अपने प्लेटफार्म से स्वतंत्र भारतीय होने के नाते सवाल उठाने के अधिकारी भी है।* लेकिन बात यह भी हो सकती है कि बड़े बड़े मीडिया चैनल के एंकरों को अपने आकाओं से टीआरपी गिरने की डांट पड़ी हो या जो मुद्दे उन्होंने उठाने थे वह ऑनलाइन बैठे शिक्षक उठाये हो तो उन्होंने उसका गुस्सा मुँह जुबानी तीखे शब्दो मे निकालना संभव समझा हो।
हन ऑनलाइन प्लेटफॉर्म में आज हर कोई कैमरा लेकर पत्रकार बने घूम रहा है उनपर निश्चित ही लगाम लगानी चाहिए किन्तु जो कम दाम पर, या कोई कोई मुफ्त शिक्षा देकर दूर दराज के क्षेत्रों में बैठे छात्रो को एक प्लेटफार्म, एक चैनल से कई विषय पढ़ा रहे है उनपर गुस्सा उतारने के बजाय खुद को सतम्भकार की असल भूमिका में खड़े करने को कोशिश करें तो भारत की रैंकिंग जरूर सुधरेगी।