अर्जुन सिंह भण्डारी
देखो क्या हो गया है मेरी धरती को आज,
फूलों का बगीचा था जहां, खेत खलिहानों में फसलें थी जहां वहाँ आज गगनचुंबी इमारतें है,
जंगल थे जहां वहां औद्योगिकी है आज,
हरियाली के नाम पर आज आसमान में काला धुंआ है,
साफ हवा में हज़ारों अवांछित कणो का जहर घुला है।।
हर दिन हजारों पेड़ हम खुद से काटते है,
फिर क्यों अब शुद्ध हवा बची नही, का दुखड़ा रोते है,
जावनरों का घर हमने ही तो अपने हाथों से काटा था, अपने लिए महंगे सामानों को घरो में शोक से सजाने को पेड़ो को चीरा था,
शहर से दूर शांत आबोहवा में रहने को जानवरो के घरों को उजाडा था,
फिर क्यों आज हम विलुप्त प्रजाति पर चिंता व्यक्त करते है,
क्यों जनवरो के हमारे बीच आने पर डरते है।।
शहर में आज धुआं ही धुआं है,
सांस लेने में दम घुटता है,
प्रदूषण सबसे बड़ी समस्या है,
निवाराण को हर वर्ष मंथन होता है,
पर दूसरे ही छोर पर देश को प्रगति देने को 'विकास के नाम पर दोहन' का क्रम दोहराया जाता है।।
आज हम ग्रीन, क्लीन, एनवायरनमेंट का नारा देते है,
साईकल पर पुनः चलते है- का प्रचार करते है,
क्यों न हम प्रकृति को वापिस करे जो उससे लिया है,
हर दिन एक पौधा लगाए अपनो के नाम का,
पृथ्वी को संरक्षित करें उन्ही अपनो के लिए,
सिर्फ शब्दो मे नही, हरि भरी एक धरती को पुनर्जीवित करें अपने वादे से।।