अर्जुन सिंह भण्डारी
नारी हूँ मैं,
खुद पर विश्वास है, प्रण अटल है,
हर दिन नई कठिनाइयों से लड़ती हूँ,
घर को संवारती हूँ,
कर्तव्यपथ पर नित नई ऊंचाई छूने का साहस भी रखती हूं,
पुराने जमाने की नही, आज की नही
बस नारी हूँ नारी सा गौरव रखती हूँ।।
जानती हूँ समाज मे आज भी मैं कई जगह गिराई जाती हूँ,
कभी पति की मार से कभी दहेज के तानों से हर दिन तोड़ी जाती हूँ,
नया परिवार संवारने को हर मर्तबा खुद के 'सपनो' को विराम दे देती हूं,
बच्चो की खुशी के लिए ''त्याग" की मूरत बन जाती हूँ,
हर दिन थकती हूँ,
पर हर सुबह सबकी जिम्मेदारी का भार नई ऊर्जा संग उठाती,
नारी हूँ बस यही गौरव खुद के लिए मांगती हूँ।।
बचपन से अपनो के "बेटा होना चाहिए" के शब्दों के तीर संग सपनो की उड़ान भरी है,
आज चांद पर हूँ, तो दुश्मनों को भू- जल-नभ में हराने की काबिलियत भी रखती हूं,
भारत के सलाम की हकदार मैं हर बार बनी हूँ,
मेरा बेटा है तू, यह अब नही सुनना है,
बेटी हूँ, बेटी से गौरव चाहने की चाहत रखती हूं,
नारी हूँ, नारी सा गौरव रखती हूँ।।
हन, आगे बढ़ने को सबको साथ आज चलना है,
पर भूल है उनकी जो समझते है वह नही तो नारी कुछ नही,
याद है न झांसी की रानी, इंदिरा गांधी, कल्पना चावला जैसी नारी,
जिन्होंने खुद का मुकाम बनाया है,
भारत का अस्तित्व भी तो " माता" से ही पुकारा गया,
उसी "नारी" का हिस्सा हूँ,
माँ-बाप का गौरव हूँ,
नारी हूँ नारी सा ही गौरव रखती हूं........